एक कविता… हर बेशर्म बेटी, बहु और माँ के नाम !

woman wearing white top covering her face while leaning on white painted wall
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प्रिय पाठको

आज मैं आपसे सिर्फ के कविता नहीं, मेरे कलेजे का टुकड़ा बांटने वाली हूँ. यह कविता मैंने तब लिखो थी जब ‘निर्भया’ के साथ अत्याचार हुआ था. इसके हर शब्द में आक्रोश है, सवाल है. यह हमारे समाज की विडम्बना है की एक ओर हम नारी को पूजते हैं ओर  दूसरी ओर उसके हर एक कदम को आंकते हैं.

उम्मीद है आप इस कविता को पसंद करेंगे. अपनी टिपण्णी ‘कमेंट’ करके ज़रूर शेयर करे. इस मंच पर लेखन सिर्फ अपने विचारों को औऱ महिलाओं से बांटना है. आप सबसे निवेदन है, अगर आप इस कविता को ‘शेयर’ करे तो मेरा नाम ज़रूर समिल्लित करे.

 

आपकी प्रियम

 

एक कविता…बेशर्म नारी के नाम !

ये आजकल की बेशर्म लड़कियां लड़कों से टकराती है

उन्मुक्त कपडे पहन , बेवक़्त सड़कों पर मंडराती है.

ना शर्म किसी अपने का , ना  भय किसी अनजाने का

बदहवास नीर सी बस बहती चली जाती है

निर्भय निडर निर्भीक  , तेज़ गति से  वाहन दौड़ाती  है

ये आजकल की बेशर्म लड़कियां बस बेशर्मी फैलाती है.

किसी मर्द की  टोह  बिना ये मनमाती चलाती  है

‘ चार लोगों’ के डर से दूर ये खुदको सशक्त  बनाती है.

दसवीं बारहवीं में ‘टॉप’ कर खुदको आगे बढाती है

खेल खुद के मैदान में भी बाज़ी मार जाती है.

रेल गाडी को अपने गंतव्य पर पहुँचाती है,

इतनी आसानी से ये कैसे हवाई जहाज़ उड़ाती है ?

फ़िक्र नहीं माँ बाप की ज़िम्मेदारी का

पच्चीस  की उम्र तक भी बिन ब्याही रह जाती।

करियर‘ बनाने की होड़ में

लड़कों के कंधे से ये कन्धा ऐसे मिलाती  है.

शादी के बाद भी पर्स लिए ऑफिस में इतराती है.

मंगलसूत्र की निशानी हटा

 माथे पर ब्याहता का चिन्ह यह कहाँ लगाती है !!

माहवारी‘ की तकलीफों को ये खुलकर दर्शाती है.

बिन दुपट्टे के सूट में ये इज़्ज़त कहाँ छुपाती है!

नज़र भर देख लो तो बड़ा बवाल मचाती है.

छू लो तो ‘कैंडल मार्च’ की धमकी देकर जाती है

जवाब दे  ऐ  नारी तू अब क्या करना चाहती है ?

हम लड़को के राज पाठ  को तू क्यों   हथियाना चाहती है ???

(एक बेशर्म नारी का जवाब )

मैं निर्भय निडर निर्भीक

सड़कों पर मंडराने वाली

उन्मुक्त विचारों को व्यक्त कर बेशर्मी फैलाने वाली

सदियों  दमन सहकर तुम्हें सर का ताज बनाने वाली

जन्म देकर तुम्हें, तुम्हारी अधीन कहलाने  वाली!

दसवीं बाहरवीं ‘टॉप’ कर सरस्वती की झलक दिखलाने वाली

रेल हवाई जहाज़ उड़ाकर प्रगति की उड़ान भरने वाली।

लक्ष्मी  हूँ मैं , काली हूँ मैं, दुर्गा का अवतार हूँ मैं

सृस्टि के  हर एक को जनने वाली कोख का वरदान हूँ मैं !

माहवारी जतलाने का मकसद तुम्हें एहसास दिलाना है

हर महीने खून बहाकर आसान कहाँ मुस्कुराना है !!

आज़ाद भारत की बेटी हूँ मैं

आज़ाद हिन्द को जगाना है

इस आज़ाद देश में एक आज़ाद कोना पाना है.

कुरीतियों का अंत कर , जीत का झंडा फहराना है.

क्यों शर्म करूँ कपड़ो से , क्यों भय हो मुझे अपनों से?

बाँध से छूटी  नीर हूँ मैं, बहने लगी हूँ कल कल से

पंख फैलाना है मुझे

नील गगन में उड़ने के लिए.

क्यों  मोमबत्ती लेकर  तुम सड़को पर मंडराते हो

जब एक ओर हर रोज़ तुम हैवानियत फैलते हो .

क्या  रक्षक  कहलाने के लायक हो तुम ?

भक्षक बन उस राखी की लाज तोड़ जाते हो तुम !

मैं बेशर्म उन्मुक्त नारी,

सड़को पर मंडराने वाली

बहुत जल्द अपना ‘आत्मसम्मान’ पूर्णतः हूँ पाने वाली!

@कॉपीराइट 

-प्रियम शर्मा 

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  1. अद्भुत , मर्मस्पर्शी ।

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